Saturday, December 19, 2009

अपना होने का दुख

व्यंग्य


वसुधैव कुटुम्बकम~ की संकल्पना का प्रचार अवश्य ही उन लोगों ने किया होगा जो अपनों के अपनत्व से पीढ़ित रहें होंगे। संभवत: अपने दु:ख को सर्वव्यापी बनाकर, उसे घटाने के उदेश्य से ही उन्होंने यह मायाजाल रचा। अन्यथा जो मजा बिना बंधुओं-सखाओं के जीवन जीने में है, वह और कहां? यूं समझ लीजिए कि यदि आपसे किसी ने बदला लेना होगा, तो वह आपको भरे-पूरे अपनों का साथ होने की बद दुआ देगा।
क्योंकि जब आपके अपनों की संख्या बढ़ जाएगी, तो वह आपको ऐसे ही निपटा देंगे, जैसे श्यामपट पर गीला कपड़ा लिखे हुए अक्षरों को मिटा देता है।
रोजमर्रा की जिंदगी मंे आप और हम ऐसे कितने लोगों को जानते-मिलते होंेगे, जो अपनांे की कु- कृपादृष्टि प्राप्त कर, चुक गए। इसलिए इन बातों को कपोलकल्पित समझना न्यूटन के गु:त्वाकर्षण सिद्धांत का मजाक उड़ाना है। यदि आपको विश्वास नहीं होता तो आज ही अपने, अपनों में खबर फैला दें कि आपकी लाWटरी लगी है। इस सुखद सूचना को पाकर, परलोक मंे बैठे आपके अपने भी पुर्नजन्म का मोह नहीं छोड़ पाएंगे तो धरा में रहने वालों की बात ही क्या। बरसों से जिन्होंने आपको अपनी अपेक्षा के भी काबिल नहीं समझा होगा वह इस समाचार के मिलते ही आपसे इस प्रकार मिलेंगे कि श्रीराम-भरत मिलाप भी फीका पड़ेगा। उस समय आपको आदर-सत्कार और प्रेमभाव की ऐसी सरिता में स्नान करने का अवसर प्राप्त होगा कि आप गंगा स्नान की महिमा भी भूल जाएंगे। वास्तव में अपनों को अपरम्पार प्रभु ने उस समय विशुद्ध :प से गढ़ा होगा, जब धरा की सुख-शांति से देवगण कुपित हो गए होंगे। चूंकि धरा पर मानव की उत्पत्ति के समय अपनों का अस्तित्व नहीं रहा होगा, उस समय धरती भी स्वर्ग के सादृश्य रही होगी।
ऐसे में स्वर्ग में रहने वालों को धोर आपत्ति हुई होगी कि मानव तो धरा पर स्वयं में मस्त रहते हुए स्वर्ग की कामना भी नहीं करता, जबकि मानव की उत्पत्ति के समय तैयार हुए एजेंडे में इस बात का साफ उल्लेख था कि वह मानव सुख-समृद्धि की कामना के लिए महामानवों की आराधना करेगा। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ होगा तो अवश्य ही देवगण भगवान की शरण में पहुंचे होंगे, तब अपनों की रचना परमपिता को न चाहते हुए भी करनी पड़ी होगी। लंकेश्वर से लेकर अब तक असंख्यों को अपनों के हाथों लंका ढहानी पड़ी है। समाचार पत्रों में रोज ही अपनों के अपनत्त्व आधरित हिंसा की खबरें आप निश्चय ही ग्लानि से भर पढ़ते होंगे। अब आप ही विचार करें कि आप अपनी किश्ती अपनों के सहारे डुबाएंगे या फिर अकेले मस्त पिज्जा का मजा उठाएंगे।

25 comments:

प्रदीप जिलवाने said...

ब्‍लॉग अच्‍छा लगा. पहली पोस्‍ट में आपने उल्‍लेख किया है कि द्वीपांतर पञिका निकालने की योजना है, क्‍या यह पञिका निकल रही है. यदि कोई अंक निकला हो तो बताइयेगा. इधर खरगोन में जनवरी के अंतिम सप्‍ताह में 'हिंदी साहित्यिक लघुपञिका प्रदर्शनी एवं कार्यशाला' का आयोजन होना है. इस प्रदर्शनी में 'द्वीपांतर' को भी शामिल कर मुझे प्रसन्‍नता होगी. आपको ई-मेल करना चाहता था लेकिन आपकी पोस्‍ट पर कोई ई-मेल पता उपलब्‍ध नहीं है. इसलिए अपनी बात आपके ब्‍लॉग पर लिख रहा हूं. यदि अनुपयोगी लगे तो delete कर देना. साथ ही आप मेरे ब्‍लॉग पर आये, और अपनी उत्‍साहवर्धक टिप्‍पणी दी, मेरा आभार स्‍वीकारें.
अब आपके ब्‍लॉग पर निरंतरता बनी रहेगी.
शुभकामनाओं सहित...
-प्रदीप जिलवाने, खरगोन

alka sarwat said...

द्वीपांतर पत्रिका के लिए मेरी शुभकामनाएं और यथाशक्ति सहयोग प्रेषित है
अपनों की बढ़िया व्याख्या की है आपने ,मैं आपसे सहमत हूँ

मनोज कुमार said...

आपका आलेख अच्छा लगा। शुभकामनाएं।

तोसे लागे नैना said...

द्वीपांतर पत्रिका के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।

सुनीता शानू said...

श्यामपट पर गीला कपड़ा लिखे हुए अक्षरों को मिटा देता है।
क्या व्याख्या की है अपनों की! गज़ब!

S B Tamare said...

प्रिय नीरज जी ,

आपकी पत्रिका मुझे बड़ी पसंद आई / एक ब्लॉग को पत्रिका के रूप में लिया जाना नया और रोचक विचार है जो आपकी रचनात्मक सोच को दर्शाता है किन्तु विषय वस्तु के चुनाव में पूर्वाग्रह और नकारात्मकता की छाप दिखती है यह मेरा विचार आपके ''अपना होने का दुःख'' पढ़ कर बना / मै बिना ब्लॉग पूरी तरह पढ़े अपनी टिपण्णी नहीं देता , यह मेरा स्वभाव है और पढने के बाद जो मै अनुभूत करता हूँ उसे छुपाना जायज नहीं समझता लिहाजा जो उचित लगा वो लिख रहा हूँ की ''वसुधैव कुटुम्बकम '' एक संस्कृति रुपी दूध से अथक प्रयास से प्राप्त घी है जिससे दुसरे मिष्ठान पकाए जाते है और समाज की क्षुधा शांत करते है लिहाजा गहन चिंतन मनन के साथ लिखा विचार ही आपकी लोकप्रियता बढा सकता है /

पुनश्च, अति उत्तम रचनाओं की उम्मीद है आपसे जरूर भविष्य में पूरी होगी /थैंक्स/

हास्यफुहार said...

द्वीपांतर पत्रिका के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।

JHAROKHA said...

AApakka Lekh bahut hi prabhava shali hai . Aap ne katu satya liha hai .main aap ke sath hun nai patrika ke liye subh kamanaon ke sath .

वन्दना said...

bahut hi badhiya lekh............dweepantar ke liye badhayi.

kumar zahid said...

आप मेरे ब्‍लॉग पर आये.आभार.
dweepantar patrika ke liye shubhkamnayein.
ghazal ke liye click karein :
http://merihaseenghazalein.blogspot.com

रचना दीक्षित said...

क्षमाप्रार्थी हूँ ब्लॉग पर देर से आने के लिए कुछ समयाभाव था.एक बहुत अच्छी पोस्ट . हर शब्द अपनी दास्ताँ बयां कर रहा है आगे कुछ कहने की गुंजाईश ही कहाँ है बधाई स्वीकारें
द्वीपांतर पत्रिका के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।

रचना दीक्षित said...

क्षमाप्रार्थी हूँ ब्लॉग पर देर से आने के लिए कुछ समयाभाव था.एक बहुत अच्छी पोस्ट . हर शब्द अपनी दास्ताँ बयां कर रहा है आगे कुछ कहने की गुंजाईश ही कहाँ है बधाई स्वीकारें
द्वीपांतर पत्रिका के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आपका लिखा लेख बहुत पसंद आया ...सही सच्ची लिखा है आपने .द्वीपांतर पत्रिका के लिए मेरी शुभकामनाएं

shama said...

Aisa to hota hai,lekin chand apne hote hain,wo har haal me saath nibhate hain!

chopal said...

लेख बहुत पसंद आया ...
द्वीपांतर पत्रिका के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।

saraswatlok said...

द्वीपांतर पत्रिका के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।

kabir said...

द्वीपांतर पत्रिका के लिये हार्दिक शुभकामनाएं।

kabir said...

आपका आलेख अच्छा लगा। शुभकामनाएं।

ज्योति सिंह said...

bahut hi achchha laga yahan aakar aur ye umda post padhkar patirika ke liye badhai

kamal said...

द्वीपांतर पत्रिका के लिए मेरी शुभकामनाएं

Simran said...

आपका आलेख अच्छा लगा।

Sejal said...

dweepantar ke liye badhayi.

Anjali said...

aapke article bahaut accha laga.....khaaskar pizza wali line
dweepanter ko meri hardik shubhkamnaye

Neha said...

mujhe aapke articles bahaut acche lage... umeed karti hu ki aap aage bhi aise majedaar articles yaha post karenge.....

mai wait karungi aapke agle articles ka

wish u very happy new year

karuna said...

आपका आलेख अच्छा लगा। शुभकामनाएं।
k.k.singh