Friday, January 1, 2010

युवाओं में कम होती रिश्तों की अहमियत

लेखक-रेनू त्यागी कोटियाल

भाग दौड़ भरी जिंदगी और पीछे छूटते संस्कार लगभग यही हाल है आज की युवा होती पीढ़ी का। आज के युवा रिश्तों को निभाना तो दूर सीरियस लेना भी जरूरी नहीं समझते। बड़े-बूढ़े, मां-बाप, भाई-बहन, चाचा, मामा ये सब रिश्ते उन्हें अब शब्द मात्र बेमानी से लगने लगे हंै। सिर्फ अपने में ही मस्त रहने वाली आज की ये पीढ़ी अपने बुजुर्गांे से पीछा छुड़ाती नजर आ रही है। एकाकी जीवन को पूर्ण मानने की भावना के कारण जीवन के महत्पूर्ण रिश्ते जो कि उनके जन्म के साथ ही उनसे जुड़े होते हैं वो उनके लिए बोझ बन रहे हैं। उनके अपने मां-बाप, दादा-दादी उनके लिए बोझ बनने लगे हैं। इनके पर आधुनिक सभ्यता इतनी हावी हो चुकी है कि इन्हें ये भी ख्याल नहीं कि जिन रिश्तों की वो बलि देकर आगे बढ़ रहे हैं बुरे वक्त में उन्हें इन्हीं रिश्तों की जरूरत होगी। आखिर क्यों बदल रहा है युवाओं का नजरिया। आइये डालते हैं एक नजर कि कौन सी बात है जिससे बदल गये है रिश्तों के मायनें।

नैतिकता का अभाव- वर्तमान शिक्षा प्रणाली और पहले की शिक्षा प्रणाली में यही फर्क है कि जहां पहले की शिक्षा प्रणाली मंे नैतिकता का असर था वहीं आज की शिक्षा पद्धति में नैतिकता कही दूर-दूर तक भी नजर नहीं आती।परस्पर प्रेम, सदभाव और समर्पण की भावना का विकास करने वाली बातें अब नीतिशास्त्र के वो अध्याय बन गए हैं जिनका पठन पाठन तो युवा करते हैं परंतु उनका अनुसरण करना उनको नहीं आता। आज की शिक्षा पूरी तरह से व्यावसायिक मूल्यों को ध्यान रखकर दी जा रही है जिसका असर सीधा हमारे नैतिक मूल्यों पर पड़ रहा है। इसी से आज युवाओं के दिल में मानवीय संवेदना खत्म होती जा रही है।

पाश्चात्य जगत का प्रभाव- आज का युवा वर्ग ये सोचता है कि अगर वो पाश्चात्य सभ्यता को अपना लेगा तभी वो जीवन में आगे बढ़ सकेगा है। इसी वजह से आज वो अपनी संस्कृति अपने आदर्शांे की बलि दे रहे हैं इसका नतीजा ये हो रहा है की धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का यानि न वो पूरी तरह से अपने कल्चर में ढल पर रहे हंै और न ही पश्चिमी सभ्यता में। आज के युवाओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिये की वो जिस कल्चर के लिए पागल हुए जा रहे हैं वहां के लोग आज हमारी सभ्यता को अपना रहे है। अगर हम अपने कल्चर का पालन करे तो जाहिरतौर पर तरक्की हमारे कदमों में होगी।

बदलाव का दुश्परिणाम- समय के साथ संयुक्त परिवार की परंपरा खत्म ही होती जा रही है जहां पहले संयुक्त परिवार में रहना जरूरी माना जाता था इसी प्रकार आज के युवाओं में यह मानसिकता पनपती जा रही है कि अगर आप अलग रहोगे तो जिन्दगी अपने ढ़ग से जी सकते हो ये बात ठीक है कि इसमें आप अपना जीवन अपनी स्टाइल में बीता सकते हो लेकिन जब आप पर बुरा समय आयेगा तो आप उस दिन भीड़ में अकेले ही रह जाओगे इसलिए तो किसी ने कहा है एकता में शक्ति है।
अपनी धुन में रहना- आज के नौजवान अपनी एक दुनियां बना लेते है और उसी में मस्त रहते है। वो चाहते है उनकी दुनियां में कोई दखल न दे और अगर कोई ऐसा करता है तो उन्हें लगता है कि वो उनकी राह का सबसे बडा रोड़ा है और वो उस रिश्ते से सदा के लिए निजाद पा लेना चाहते है। अब आलम यहां तक आ चुका है कि ये वर्ग अपनी जिम्मेवारियों से भी दूर भागने लगा है चाहे वो पारिवारिक जिम्मेदारियां हो या खुद के मां-बाप की।

20 comments:

मनोज कुमार said...

आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

हास्यफुहार said...

बेहद पसंद आई।

Rani said...

nice article
Happy New Year Dweepanter

Saurabh said...

Nav Varsh 2010 Aapke Liye Accha Saabit Ho Yahi Meri Ishwar Se Prathna Hai... Aur Umeed Karte Hai Ki Aapki Magzine Aagey Bade

kabir said...

2010 Khusihiyoon Sa Ho Aur Aap Aagey Badho Aur Hum Ummed Karte Hai Ki Aise Hi Aur Bhi Articles Aap Yaha Pubhish Kare Aur Hum Unhe Pad Sake....


Happy New Year 2010

Rohit said...

article accha hai
aaj kal aise bahaut se case hai aur bahaut parents hai jo aise samasya se jujh rahe hai

accha likha hai aapne

Prakash said...

achi hai aapki soch aur aapka article

bahaut acchi lines hai aur umeed hai agey bhi aise hi aap liko

Umesh said...

acha hai article

youth par accha focas kiya hai

Renu said...

aajka uva kaisa hai aur kya soch rakhta hai ye is article se pata chalta hai...

acha focas hai aur kaafi accha article

Sakshi said...

21 century mai shravan ki umeed karna ye nahi ho sakta

kyuki aajka uva apne saamne sabko chota hi samajhta hai, usey rok-tok pasand nahi apni tarah hi jina chahta hai wo....

kaafi accha topic hai aur acticle
padkar accha laga

Raima said...

aaj kisi ko bhi rok-tok pasand nahi aur koi bhi bado ko pasand nahi karta chaihe wo use acchi hi taalim hi kyu na de phir bhi wo unhe apna dushman manta hai...
aajki soch kis tarah ki hai aur aajka uva kya sochta hai ye is article se pata chalta hai....

acchi soch aur ussey bhi accha article hai....

Ranbir said...

samay ke saath soch bhi badalti hai aur generation bhi...
agar parents aajke time mai ye umeed karte hai ki uska beta ya beti uska budhape mai saath denge to ye uski kaafi had tak galat soch hai.... aur isi soch ko ye article ke madhyam se aapne samjaya hai
accha laga pad kar article

Saurabh said...

rishte kuch maine nahi rakhte aaj ke time mai bas carrier aur paisa nazar aata hai....

soch acchi hai
par aajke time mai only money-money

kaafi had tak sahi hai ki aajki youth apne relations ko jyada maine rahi rakhti

Sejal said...

acchi soch hai aur article

chopal said...

आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

saraswatlok said...

आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

saraswatlok said...

आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

संजय भास्कर said...

आपको नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएं।

Trinath Mishra said...

this is quite right what commented at blog......i am in fevour o this thinking.....

trinathm.blogspot.com

Trinath Mishra said...

good writing