लेखक- नीरज
धारावाहिक कहानी

‘‘बापू, आज पिफर पी कर आए हो।’’
हां पी कर आया हूं। तू सवाल-जवाब करने वाला होता कौन है? जो तेरा काम है उसी में ध्यान लगा। फालतू में दिमाग खराब मत कर चल भाग यहां से।’’ तारे ने गुस्से से भानू से कहा।
भानू तारे का 16 वर्षीय बालक था। पिछले दो वर्षों से वह नौंवी कक्षा से निकलने का असफलत प्रयास कर रहा था। इस बार यह उसका तीसरा चांस था। लेकिन इससे यह अनुमान लगाना कि वह पढ़ाई में शुरू से ही फिसड~डी रहा है, गलत होगा। आठवीं कक्षा तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर वह कक्षा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुका था। सोचने व समझने की उसमें गजब की शक्ति थी, परंतु उसके भाग्य में कुछ और ही लिखा था।
पढ़ाई से दिन-प्रतिदिन हटती उसकी रूचि से साथी विद्यार्थी और अध्यापक हैरान व परेशान थे। यहां तक कि उस गरीब तबके के विद्यार्थी भानू के लिए स्कूल के प्रींसिपल तक चिंतित थे। और हो भी क्यों न, इसी भानू ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से कई बार स्कूल का नाम रोशन किया था।
‘‘अपनी अम्मा से थाली लगाने को कह दे’’ कुल्ला करते हुए तारे ने कहा।
यह सुन भानू घबराते हुए बोला, ‘‘अम्मा की तबियत ठीक नहीं है बापू। सुबह से ही बुखार में तपने के कारण अम्मा आज खाना नहीं बना सकी।’’
तारे तिलमिला उठा, ‘‘क्या हो गया उसे? मर तो नहीं गई। आदमी सुबह से शाम तक मजदूरी करें, इनके नखरे सहे और फिर खाना भी नसीब न हो। हद हो गई।’’
भानू जानता था कि बापू क्या मजदूरी करता है। सुबह से शाम तक एक ही फिक्र में रहता है कि शाम तक जैसे भी हो, जहां से भी हो बस एक बोतल लायक मजदूरी का इंतजाम हो जाए। घर की कोई चिंता नहीं है, कोई जिए या मरे। कैसे खर्च चलता है और कहां से राशन आता है इन सब बातों से उसे कोई लेना-देना नहीं है। हां, दो वक्त की रोटी उसे जरूर मिल जानी चाहिए।
यह तो उसकी अम्मा ही है जो दूसरों के घर मेहनत-मजदूरी कर दो वक्त की रोटी जुटाने का बीड़ा उठाए हुए है, किंतु आज अम्मा की तबियत खराब होने से न वो काम पर जा सकी और न ही खाने का कोई प्रबंध् हो सका। यहां तो रोज सुबह कुंआ खोदो व पानी पीओ जैसे हालात थे।
तारे के ये बाण पार्वती के कलेजे को भीतर तक भेद गए थे। वह तो सुबह ही काम पर जाने को उठ खड़ी हुई थी, लेकिन भानू ने उसकी बिगड़ती हालत देखकर उसे कहीं न जाने की अपनी कसम दे डाली।
मां आखिर करती भी क्या? एक तो बीमारी से लाचार और दूसरा बेटे का प्यार। दोनों बातों ने उसे रूकने पर विवश कर दिया और इस रूकने का परिणाम अब उसके सामने था।
तारे लेटे हुए लगातार बड़बड़ाता जा रहा था। इस बड़बड़ाहट में उसे कब नींद ने अपने आगोश में ले लिय उसे पता न चला। तारे का व्यवहार दिन-दिन रूखा होता जा रहा था, लेकिन वो दिन भी थे जब घर में चारों और खुशहाली थी। तारे घर की चिंता में लगा रहता था। उसे भानू की पढ़ाई की फिक्र थी। पार्वती की इच्छा व उसकी जरूरतों का ध्यान था। वह दिन में जितना कमाता उसे शाम को पार्वती के हाथ पर रख देता। उस थोड़ी-सी कमाई से भी घर में खुशहाली व सुख-शांति का माहौल था।
भानू को प्रथम श्रेणी पाते देखकर तारे खुशी से फूला न समाता और उसे और अधिक मेहनत के लिए प्रेरित करता। भानू भी पिता की इच्छानुसार खूब मन लगाकर पढ़ाई करता और अपनी प्रतिभा व क्षमता को हर स्तर पर साबित कर दिखाता।
किंतु पिछले कुछ सालों में सब कुछ बदल गया। जब से तारे को शराब रूपी जहर की लत ने घेरा है सारा घर बर्बाद हो गया। अब उसका एकमात्र प्यार व जरूरत दारू बन गई थी।
आरंभ में शराब को लेकर मियां-बीवी में जो बहस होती थी, उसका असर धीरे-धीरे भानू की पढ़ाई पर भी दिखाई देने लगा था। कक्षा में सदैव प्रथम आने वाले भानू के लिए अब पास होना एक स्वप्न बन गया था। रोज-रोज होने वाले झगड़े, गली-गलोच, मारपीट तथा घरेलू कलह ने उसके बाल मस्तिष्क को बुरी तरह झकझौर डाला था।
अद~भूत सोचने-विचारने की शक्ति रखने वाले भानू की बुद्धि को जो जंग लगा था उसके मूल में नि:संदेह उसका घरेलू कलह ही था। किंतु इस ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया।
सुबह तारे की आंख देर से खुली। पार्वती व भानू को उसने कई आवाजें दीं किंतु कोई उत्तर न मिला।
‘‘न जाने कहां मर गए। आदमी मरे या जिए, सुखी हो या दुखी। इन्हें किसी की कोई पिफक्र नहीं है। अपनी ही मस्ती में रहते हैं। हरामखोर हैं दोनों।’ अपनी टीस निकालते हुए तारे बड़बड़ाया।
‘‘एक दिन भी काम पर नहीं गया तो सब पता चल जाएगा। आटे-दाल का भाव शायद मालूम नहीं है। जाओ आज नहीं जाता।’’ तारे ने मन में सोचा, किंतु अगले ही पल अपनी बोतल का ख्याल आते ही घर से निकल पड़ा।
रात को देर से घर आना तारे की आदत बन चुकी थी। मां-बेटा आधी रात के बाद तक उसकी बाट जोहते। किंतु तारे कभी-कभी पूरी रात न आता।
कई बार भानू के मन में आता कि यह कैसा जीवन है? हंसी-खुशी की कोई बात नहीं। केवल दु:खों को सहना, भूख-प्यास से लड़ना व देर रात तक इंतजार करना। क्या यही उसकी नियति है? शेष अगली पोस्ट में-